प्राकृतिक खेती ( जैविक खेती ) परिभाषा, सिद्धांत , लाभ एवं हानियां।



प्राकृतिक खेती क्यों-

आइए जानते हैं, वर्तमान समय में हमारे देश में प्राकृतिक  खेती की आवश्यकता क्यों है। हमारे देश में खाद्यानों की आपूर्ति के लिए साठ के दशक में हरित क्रांति आई, जिसमें धान एवं गेहूं की बौनी किसमें इजाद की गई, क्योंकि इन किस्मों का पैदावार अधिक था। बौनी किस्मों के आनेे से रसायनिक खादों का प्रयोग अधिक होने लगा, फलतः जमीन की उर्वरा शक्ति घटती चली गई, इसके साथ-साथ बीमारी व कीटों का प्रकोप भी बढ़ने लगा, जिससे निवारण के लिए रसायनिक दवाइयों का प्रयोग अधिक होने लगा। भूमि, पानी व वातावरण प्रदूषित होने लगे, रसायनों के अधिक प्रयोग से भूमि में विद्यमान सूक्ष्मजीव केंचुए इत्यादि की क्रियाशीलता कम होती चली गई, इसके फलस्वरूप भूमि का भौतिक, रासायनिक व जैविक संतुलन बिगड़ गया और कृषि योग्य भूमि घटते जा रही है, इसकेेे साथ ही प्रदूषण के कारण वैश्विक जलवायु में भी परिवर्तन हो रहा है, जिससे फसलोंं, पशुओं व मनुष्यों का जीवन प्रभावित हो रहा हैं, अतः भविष्य के खतरों को देखते हुए हमें प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

परिभाषा-

प्राकृतिक खेती कृषि की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग ना करके, जैविक उर्वरकों और जानवरों या पौधों के कचरे से प्राप्त कीट नियंत्रण का उपयोग किया जाता है। प्राकृतिक खेती पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में सहायक है।

प्राकृतिक खेती के सिद्धांत-

1. देेेशी गाय-  प्राकृतिक खेती मुख्य रूप से देसी गाय पर आधारित है, देसी गाय के 1 ग्राम गोबर में 300 - 500 करोड़ तक सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, जबकि विदेशी गाय के 1 ग्राम गोबर में केवल 78 लाख सूक्ष्म जीवाणुुु होते हैं । देेेशी गाय के गोबर एवं गोमूत्र की महक से केंचुए भूमि की सतह पर आ जाते है, और भूमि को उपजाऊ बनाते हैं, देेेशी गाय के गोबर में 16 मुख्य पोषक तत्व होते हैं । पौधों को विकास के लिए इन्हीं 16 मुख्य पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ये 16 पोषक तत्व देशी गाय के आत  में निर्मित होते हैं, इसलिए देशी गाय प्राकृतिक खेती का मूल आधार है।
2. जुताई प्राकृतिक कृषि खेती में गहरी जुताई नहीं की जाती है क्योंकि यह भूमि की उपजाऊ शक्ति को कम कर देती है
3. जल प्रबंधन- प्राकृतिक कृषि में सिंचाई पौधों से कुछ दूरी पर की जाती है। पौधों को कुछ दूरी से जल देनेे के कारण पौधों की जड़ों की जड़ों की लंबाई बढ़ जाती है, जिस वजह से पौधों के तनों की मोटाई भी बढ़ जाती है, परिणाम स्वरूप पौधों का विकास अधिक होता है , और उत्पादन बढ़ जाता है।
4.आच्छादन - भूमि की सतह को फसल के अवशेषों से ढकना आच्छादन कहलाता है। इससेे पानी की बचत होती है , और भूमि से कार्बन भी नहीं उड़ता जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है , आच्छादन से नमी बनी रहती है , जिससे सुक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होता है , और देशी केचुओं की गतिविधियां बढ़ जाती है ।देसी केचुओं की विष्ठा में सामान्य मिट्टी से 7 गुना अधिक नाइट्रोजन , 9 गुना  अधिक फास्फोरस और 11 गुना अधिक पोटाश होता है।
5. पौधों की दिशा- प्राकृतिक कृषि में पौधोंं की दिशा उत्तर दक्षिण होती है । जिससे पौधों को सूर्य का प्रकाश अधिक समय तक मिलता है। पौधों से पौधों की दूरी अधिक होने के कारण पौधोंं को सूर्य सेेे अधिक मात्रा में ऊर्जा प्राप्त होती है। पौधों से पौधोंंं की दूरी अधिक होने के कारण ,ल कीट की संभावना भी कम हो जाती है। पौधों की दिशा उत्तर दक्षिण होने से उत्पादन 20 गुनाा बढ़ जाता है।
6. सहयोगी फसलें प्राकृतिक कृषि में मुख्य फसल केेेेेेेेेे साथ सहयोगी फसलों की खेती भी एक साथ की जाती है। जिससेेेे मुख्य फसल को पोषक तत्व नाइट्रोजन 
फास्फोरस, पोटाश इत्यादि मिलता रहे एवं मुख्य फसल पर कीट नियंत्रण भी साथ-साथ किया जा सके।
7. देेेशी बीज प्राकृतिक कृषि में देेेशी बीजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है,  क्योंंकि देेेशी बीज कम पोषक तत्व लेकर अधिक उत्पादन देते हैं। देसी  बीजों को हम कई वर्षों तक बुवाई में प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार बीज पर होने वाले व्यय को कम किया जा सकता है।
8.देेेशी केंचुएप्राकृतिक कृषि में देेेशी केंचुए का महत्वपूर्ण योगदान है। देेेशी केंचुए भूमि के अंदर जब ऊपर नीचे आवागमन करते हैं, तो मानो भूमि की जुताई कर रहे हों। यह भूमि के अंदर छेद कर अपनी विष्ठा से भूमि की सतह को पोषक तत्वों से समृद्ध बनाते हैं। केंचुए की गतिविधि के लिए भूमि पर सूक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होना चाहिए, अगर सूक्ष्म  पर्यावरण का निर्माण नहीं होता है, तो केंचुए अपना कार्य नहीं कर पाते हैं इसलिए भूमि का आच्छादन किया जाता है।
9.सुक्ष्म पर्यावरण-  प्राकृतिक कृषि में 65 -72% तक नमी 25-32 डिग्री तक वायु का तापमान भूमि के अंदर अंधेरा और छाया होना चाहिए, इन परिस्थितियों को ही सुक्ष्म पर्यावरण कहते हैं,यह परिस्थितियां आच्छादन द्वारा निर्मित की जाती है।

10.केषाकर्षण शक्ति( पृष्ठ तनाव)- प्राकृतिक कृषि में पौधेेे  केषाकर्षण शक्ति द्वारा मिट्टी की गहराई से पोषक तत्व को प्राप्त करते हैं । रासायनिक खेती में रासायनिक खाद के प्रयोग के कारण केषाकर्षण शक्ति कार्य नहीं कर पाती है, क्योंकि केषाकर्षण शक्ति के कार्य के लिए मिट्टी के दो कणों के बीच 50 % नमी व 50% हवा का संचरण होना चाहिए, जबकि रासायनिक खेती में यूरिया के प्रयोग से 46%, नाइट्रोजन और 54 % नमक मिट्टी के दो कणों के बीच जमा हो जाता है। प्राकृतिक कृषि में केंचुए की गतिविधियां अधिक होने के कारण मिट्टी के दो कणों के बीच 50 % नमी और 50 % हवा का संचरण होता है, जिससे प्राकृतिक कृषि में केषाकर्षण शक्ति का प्रयोग कर पौधे अपना विकास करते हैं।

प्राकृतिक खेती के लाभ-

1. भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि होती है।
2.  सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है।
3.  रसायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है।
4.  बाजार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में भी वृद्धि होती है।
5. भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है।
6. भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होता है।
7. भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता है।
8. भूमि की जल स्तर में वृद्धि होती है।
9. मिट्टी खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है।
10. प्राकृतिक खेती में श्रम अधिक लगता है अतः यह रोजगार का अवसर प्रदान करता है।

प्राकृतिक खेती की सीमाएं-

1. प्राकृतिक खेती से रसायनिक खेती की तुलना में प्रारंभिक 3 से 5 वर्षों में फसलों की पैदावार में कमी आती है।
2. अधिकतम पैदावार के लिए प्राकृतिक खेती पर्याप्त नहीं है।
3. प्राकृतिक खेती में खरपतवार नियंत्रण पर अधिक लागत आती है।
4. प्राकृतिक खेती में कीट व बीमारियों पर नियंत्रण कठिन है।
5. प्राकृतिक खेती से भूमि के भौतिक गुणों में सुधार होता है, जिसके कारण खेत की पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है।
6. गैर मौसमी फसलें सीमित होती है और जैविक खेती में उनके पास कम विकल्प होते हैं।
7. जैविक उत्पादों में रासायनिक उत्पादों की तुलना में
अधिक खामियां और कम सेल्फ जीवन होता है।
8. प्राकृतिक खेती का प्रमुख मुद्दा अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और उत्पादन के विपणन की कमी है।


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