वर्मी कंपोस्ट क्या है इसके उपयोग लाभ एवं बनाने की विधियां

वर्मी कंपोस्ट एक कार्बनिक खाद है, जिसे केंचुए के मल से तैयार किया जाता है। यह सभी प्रकार की फसलों एवं पौधों के लिए एक संतुलित आहार है, इसमें साधारण मृदा की तुलना में 5 गुना अधिक नाइट्रोजन, 7 गुना अधिक फास्फोरस, 7 गुना अधिक पोटाश, 2 गुना अधिक कैल्शियम एवं मैग्निशियम होता है। इसमें निम्न पोषक तत्व मौजूद होते हैं:- नाइट्रोजन- 1-2%, फास्फोरस - 1-1.5%, पोटेशियम -2.5-3%

लाभ
1. वर्मी कंपोस्ट केेे प्रयोग सेे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है, जिससे उसकी जल संरक्षण क्षमता बढ़ जाती है एवंं हवा का आवागमन भी ठीक सेे होता है, जिससे पौधों का विकास अच्छी तरह से होता है।

2. वर्मी कंपोस्ट में आवश्यक पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जिससे पौधों को आवश्यक पोषक तत्वों की प्राप्ति हो जाती है।

3. इसे कार्बनिक अवशेषों से तैयार किया जाता है अतः इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता तथा हमारे स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित है।

4. रसायनिक उर्वरकों के स्थान पर इसका उपयोग करके कृषि लागत को कम किया जा सकता है।

5. वर्तमान समय में रसायनिक उर्वरकों के प्रयोग से भूमि बंजर होते जा रही है अतः टिकाऊ खेती के लिए वर्मी कंपोस्ट अत्यंत आवश्यक है।

उपयोग-
वर्मी कंपोस्ट का उपयोग खेत की तैयारी के समय पहले साल 5 टन प्रति हेक्टेयर, दूसरे साल 2.5 से 3 टन प्रति हेक्टेयर  की दर से भूमि में मिलाते हैं। इसका उपयोग बागवानी में गमलों में150-300g प्रति गमला की दर से मिलाते हैं। इसके अलावा इसका उपयोग सभी प्रकार के फलों एवं सब्जियों में किया जा सकताा है।

बनाने की विधियां-
वर्मी कंपोस्ट बनानेे की अनेकों विधियां हैं। हम उन विधि पर चर्चा करतेे हैं, जिससे कम लागत में वर्मी कंपोस्ट को तैयार किया जा सकता है।

विधि 1-
वर्मी कंपोस्ट बनाने की यह बहुत ही सरल एवंं सस्ती विधि है। इसमें हम पुआल एवं अन्य फसलों के डंठल का उपयोग करके बेड तैयार करते हैं। बेड की ऊंचाई 0.5m , चौड़ाई-1m एवं लंबाई जगह के हिसाब से रखते हैं। तत्पश्चात बेड में 1.5ft की ऊंचाई तक सड़े गले कार्बनिक पदार्थ एवं 10-15 दिन पुराना गोबर की परत बिछाते हैं।4-5 दिन तक इसे उलट-पुलट करते हैं जिससे गोबर सेेे निकलने वाली गैंसे बाहर निकल जाए। जब इस मिश्रण में हाथ डालने पर गर्मी महसूस ना हो तब इसमें केंचुओं को डालते हैं। प्रति 1m लंबाई में 1000 केंचुए उपयुक्त होते हैं। इसके बाद बेड को जूट की थैली से ढक देते हैं एवंं उस पर पानी का छिड़काव करतेे हैं। इस प्रकार 1-3 महीने में केंचुआ खाद बनकर तैयार हो जाता है। तैयार होनेेे के बाद मिश्रण बिल्कुल भुरभुरा हो जाताा है ।


विधि 2-
इस विधि में हम प्लास्टिक के बेड का प्रयोग करते हैं। प्लास्टिक बेड का उपयुक्त आकार 12×4×2ft होता है। यह प्लास्टिक बेड बाजार में आसानी से उपलब्ध है । इसके बाद बेड को किसी छायादार जगह में खंभे से लगाकर सेट करते हैं। यह ध्यान रखना है की बेड को सेट करते समय एक तरफ 1 मीटर ऊंचा रखते हैं जिससे अतिरिक्त जल बेड में जमा ना होने पाए। इसकेे बाद बेड में 8-10 इंच सड़े गले कार्बनिक पदार्थ की एक परत बिछाते हैं, दूसरी परत 8-10 इंच पुराने गोबर की बिछातेे हैं।4-5 दिन बाद तापमान की जांच करके इसमें केंचुुुआ डालते हैं। एक बेड में कम सेे कम 3-5kg केंचुआ उपयुक्त होता है। केंचुआ डालनेेे के बाद बेड को बोरे से ढक देते हैं। इस प्रकार 90 दिन में केंचुुआ खाद तैयार हो जाता है एवंं केंचुओं की संख्या बढ़कर 10-15kg तक हो जाती है। एक बेड से हम 1 साल में 5-6 चक्र प्राप्त कर सकते हैं। व्यावसायिक तौर पर वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन केे लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त विधि है।
विधि 3- 
यह विधि अन्य विधियों से थोड़ी खर्चीली परंंतु सुरक्षित है। इस विधि में सर्वप्रथम 6.5ft ऊंची शेड तैयार करतेे हैं। शेड की जगह हम बगीचे का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसके बाद हम ईट और सीमेंट से पक्की बेड तैयार करते हैं।बेड का आकार 3ft चौड़ा, 1-1.5ft ऊंचा एवं लंबाई अपनी सुविधा के अनुसार रखतेे हैं। तत्पश्चात बेड में सड़े गले कार्बनिक पदार्थ एवं 10-15 दिन पुरानाा गोबर1-1.5ft की ऊंचाई तक डालते हैं। इसके बाद 2 दिन के अंतराल पर पंजे की सहायता से उलट-पुलट करते हैं जिससे गोबर सेेेेेे निकलने वाली गैस बाहर निकल जाए और गोबर का तापमान कम हो जाए। 5-6 दिन बाद तापमान देखने के लिए गोबर में हाथ डालने पर गर्मी महसूस ना हो तो केंचुए को उसमें डालते हैं। इसके बाद बेड को पुआल या जूट के बोरे सेे ढक देते हैं। समय-समय पर नमी के लिए इसमें पानी का छिड़काव करतेे हैं। 3-4 महीने में केंचुआ खाद बनकर तैयार हो जाता हैं।
 सावधानियां- 
केंचुआ खाद तैयार  करते समय यह ध्यान देना चाहिए, कि बेड को धूप व बारिश वाले स्थान पर ना रखें, इससे अत्यधिक तापमान एवं नमी से केंचुआ मर सकता है। इसके साथ ही गोबर का प्रयोग करते समय यह ध्यान देना है कि गोबर 10-15 दिन पुराना होनाा चाहिए, क्योंकि ताजे गोबर का तापमान अधिक होता है जिसके वजह से केंचुआ मर जाता है। केंचुआ खाद प्रयोग करते समय यह ध्यान देना चाहिए की उसके साथ किसी भी प्रकार की रसायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं करनाा चाहिए, एवं प्रयोग के बाद मिट्टी को ढक देना चाहिए।

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